आज मेरी खिड़की से आई ताज़ा हवा
एक पुरानी याद दिला गयी

मेरी नानी के घर की याद।

उस घर के बराम्दे के फर्श पर लेटकर
दूर की रेल गाडी की आवाज़ सुनाई पड़ती थी।

वह आवाज़ ज़िन्दगी की भाग दौड़ की आवाज़ थी,
भाग दौड़ दूर की बात थी
आवाज़ या बुलावा थी।

नानी सारे त्यौहारों की कैलेंडर थी।

जन्माष्टमी के मासूम पैर के निशान
कटहल के पेड़ के नीचे सड गए फूलों और सूखे पत्तों के बीच से निकाले हुए नमकीन
गोबर की ताज़ा महक से साफ़ दिखता आँगन
बराम्दे के एक कोने में लटकता हुआ लकड़ी का पात्र विभूति से भरा हुआ
आँगन में फूलों की रंगीन सजावट
बालों में फूल लगाकर छोटी लड़कियों की पूजा।



चम्पक की रूह स्पर्शीय महक
काजू के पेड़ के घने बगीचे
अलग अलग आम की सुगंध से भरा हुआ कमरा
शाम के सुकूनी अँधेरे में नानी के साथ की प्रार्थना
फिर कभी मामा या चाचा का दूर से घर आना
किसी दूर अंजान शहर की अंजानी खुशबू।

गाय भेड़ बकरी मुर्गी की हलचल यहाँ वहाँ
रात को नदी के उस पार के किसी कुत्ते का भौंकना
किसी का खाना
फिर धोना
नदी से किसी मांझी की पुकार।



नानी अब नहीं रही
किसी अगरबत्ती की मौत जैसी गंध मुझे याद है।

किसी अंजान इंजन में लगे डिब्बे जैसे
ज़िन्दगी की भाग दौड़ मुझे कहीं दूर ले गयी है।

लेकिन आज भी
किसी रेल गाडी के पहिये की दूर की आवाज़
किसी ताज़ा हवा के झोंके
किसी रस्ते की चम्पक की महक
मुझे यह याद दिलाती है
कि
मैं बहुत दूर नहीं हूँ।
—संतोष कुमार कान्हा
6th September, 2013, Kathmandu
You can watch the video of my recitation of the poem here:



Receiving Second Prize in Poem Recitation in Hindi on 30.9.2013 from Sri. Ashish Sinha, First Secretary(Education),Embassy of India, Kathmandu. I recited my poem KHUSHBOO for the competition.
Thanks a ton to Vandana (Mrs. Vandana Tiwari) for writing the lines for me in the book that I keep as my anthology of poems in Hindi: