पाश की जो किताब दे कर वह मुझसे
दूर गयी
किसी वर्क़ में कुछ लिखकर
कह गयी
आज भी ढूंढ रहा हूँ
पलट रहा हूँ
न कोई पैगाम है
न कोई पता है।
–संतोष काना (santhosh kana)