तुम क्या जानो कि कैसे आंसुओं को रोक हँसते हैं हम
नींदों ने भी तभी बुलाया जब उठने की मजबूरी रही
आराम की चाहत भी कमबख्त दस्तक तभी देती है दिल पे
जब मसरूफियत दरवाज़े पे मेरा फतवा लेकर खड़ी है।
— संतोष कुमार काना

(thanks to Mugdha Wagh for the creative editing)