आज अचानक सारे रास्ते खत्म हो गए
मुड़कर देखा तो पता चला
सफर हमेशा अकेले ही था
किसी बेमानी सपने के सहारे में खो गया था
खोज रहा था ।

रास्ते के भरोसे में सफर न करना

रास्ते पर हम कम चलते हैं
चलते है अपने पर भरोसे में ।
–संतोष कुमार काना
16th September, 2013
on Onam day at Cafe u Restaurant, Lalitpur, Nepal